
शिभगवा से तिरंगा तक: RSS का ध्वज विवाद, ‘हिंदू राष्ट्र’ की परिकल्पना और मनुस्मृति का वैचारिक दबाव
प्रस्तावना: साझा पहचान का प्रतीक बनाम सांगठनिक निष्ठा
(वरिष्ठ पत्रकार राकेश प्रताप सिंह परिहार की कलम से )
राष्ट्र केवल सीमाओं और भूगोल से नहीं बनता; वह साझा स्मृतियों, संवैधानिक मूल्यों और उन प्रतीकों से बनता है जिनमें करोड़ों नागरिक अपनी पहचान देखते हैं। भारत के लिए तिरंगा एक ऐसा ही जीवंत प्रतीक है—जो विविधता, लोकतंत्र और स्वतंत्रता संग्राम का सार प्रस्तुत करता है।
इसी पृष्ठभूमि में जब देश के सबसे प्रभावशाली सांस्कृतिक-राजनीतिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), के नागपुर मुख्यालय पर लगभग पाँच दशकों तक राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया गया, तो यह केवल एक ध्वज का प्रश्न नहीं था। यह भारत गणराज्य की संवैधानिक परिकल्पना और संघ के वैचारिक ढाँचे के बीच एक गंभीर संघर्ष का ऐतिहासिक साक्ष्य था।
- पाँच दशकों की अनुपस्थिति: तथ्य और ‘फ़्लैग कोड’ के तर्क की समीक्षा
उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, RSS मुख्यालय पर 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 को तिरंगा फहराया गया था। लेकिन इसके बाद 2002 तक—लगभग 52 वर्षों तक—यहाँ तिरंगा फहराने से परहेज़ किया गया।
क्षा किसी भी राष्ट्र की चेतना का वह अक्ष्य दीप है, जो समाज को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर सामर्थ्य के भव्य आलोक में ले जाता है। परंतु, जब हम ‘वन नेशन, वन टैक्स’ या ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की बुलंद ध्वनियों को सुनते हैं, तो मन के किसी कोने में यह सवाल गहरी कौंध बनकर उभरता है—‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ क्यों नहीं?
क्या इस विविधतापूर्ण देश के अंतिम पायदान पर खड़े बच्चे को भी एक समान, वैज्ञानिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने का अधिकार नहींलो है? या फिर हमारी शासन व्यवस्था में शिक्षा केवल चुनावी घोषणापत्रों का एक निस्तेज पन्ना बनकर रह गई है?
नीतिगत विरोधाभास: समवर्ती सूची की उलझन और ‘एक राष्ट्र’ की कसौटी
‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ का विचार जितना आदर्श प्रतीत होता है, उसकी व्यावहारिक डगर उतनी ही दुरुह है। भारतीय संविधान के तहत शिक्षा ‘समवर्ती सूची’ (Concurrent List) का विषय है, जहाँ केंद्र और राज्य दोनों को अधिकार प्राप्त हैं।
भारत की सांस्कृतिक, भाषाई और प्रांतीय विविधता इतनी बहुआयामी है कि एक ही साँचे में पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को ढालना एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती माना जाता है।
यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा द्वारा देश को एक वैचारिक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया है, परंतु प्रांतीय प्राथमिकताओं और राजनीतिक मतभेदों के कारण इसे पूर्ण रूप से एक समान धरातल पर नहीं लाया जा सका। क्षेत्रीय दल अक्सर एक समान पाठ्यक्रम को अपने भाषाई व प्रशासनिक अधिकारों पर अतिक्रमण मानते हैं, जिससे ‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ की संकल्पना नीतियों के द्वंद्व में उलझकर रह जाती है।
क्या सरकारों के एजेंडे में है शिक्षा? घोषणाओं और धरातल का अंतर
राजनीतिक मंचों से शिक्षा पर लंबे-चौड़े वादे किए जाते हैं, परंतु जब बजट आवंटन और जमीनी क्रियान्वयन का समय आता है, तो प्राथमिकताओं का खोखलापन स्पष्ट दिखने लगता है।
बजट का गणित: कोठारी आयोग (1966) से लेकर NEP 2020 तक लगातार यह सिफारिश की गई कि जीडीपी (GDP) का 6% शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। परंतु व्यावहारिक रूप से केंद्र और राज्यों का संयुक्त खर्च केवल 3 से 4 प्रतिशत के इर्द-गिर्द ही अटका रहता है।
अल्पकालिक राजनीति: अवसंरचनात्मक विकास या मुफ़्त की घोषणाएँ (Freebies) त्वरित वोट बैंक का निर्माण करती हैं, जबकि शिक्षा में निवेश का प्रतिफल एक पूरी पीढ़ी के बाद परिलक्षित होता है। यही कारण है कि नीतिकारों के मुख्य एजेंडे से शिक्षा का विषय अक्सर ओझल हो जाता है।
नीति आयोग का आईना: आँकड़ों में उलझी सरकारी स्कूलों की व्यथा
नीति आयोग की ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ (मई 2026) तथा स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स (SEQI) की रिपोर्टें देश के सरकारी विद्यालयों की जो तस्वीर उकेरती हैं, वह अत्यंत चिंताजनक और आत्ममंथन योग्य है:
प्रमुख मापदंड
नीति आयोग की रिपोर्ट और आंकड़ों के निष्कर्ष
नामांकन में भारी गिरावट
पिछले एक दशक में सरकारी स्कूलों में नामांकन का हिस्सा 71% से घटकर 49.24% पर आ गया है, जबकि निजी स्कूलों में यह बढ़ा है।
स्कूलों का बंद होना
बीते 10 वर्षों में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद या विलय (Consolidate) किए गए हैं—अर्थात औसतन 25 स्कूल प्रतिदिन।
1. शिक्षकों की भारी कमी और चुनौतियाँ
1 लाख से अधिक ‘एकल-शिक्षक’ विद्यालय: देश में 1.04 लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक (Single-Teacher Schools) के भरोसे चल रहे हैं। इससे ‘मल्टी-ग्रेड टीचिंग’ (एक ही शिक्षक द्वारा कई कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाना) जैसी गंभीर समस्या पैदा हो रही है।
राज्यों में खाली पद:
कई बड़े राज्यों में शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं।
बिहार: प्राथमिक स्तर पर ही लगभग 2.8 लाख पद खाली हैं।
झारखंड: लगभग 99,500 पद रिक्त।
पश्चिम बंगाल: लगभग 77,800 पद रिक्त।
कर्नाटक: प्राथमिक स्कूलों में लगभग 22% (38,000+) पद खाली हैं।
बुनियादी ढाँचे और सुविधाओं में कमियाँ
पिरामिड जैसी खंडित संरचना: देश में प्राथमिक विद्यालय तो 7.3 लाख हैं, लेकिन उच्च माध्यमिक (11वीं-12वीं) विद्यालय घटकर मात्र 1.64 लाख रह जाते हैं। केवल 5.4% स्कूल ही ऐसे हैं जो कक्षा 1 से 12 तक की निरंतर शिक्षा देते हैं।
लैब और इंटरनेट का अभाव:
लगभग 50% सरकारी माध्यमिक स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशाला (Science Lab) नहीं है।
लगभग एक-तिहाई स्कूलों में अभी भी इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं है।
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छोटे और गैर-व्यावहारिक स्कूल: देश में 35% स्कूल ऐसे हैं जहाँ कुल नामांकित छात्रों की संख्या 50 से भी कम है, जिससे संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पाता।
सीखने के परिणाम और ड्रॉपआउट दर (Learning Outcomes & Dropouts)
ड्रॉपआउट की ऊँची दर: प्राथमिक स्तर पर नामांकन दर (GER) 90.9% है, लेकिन उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुँचते-पहुँचते यह घटकर 58.4% रह जाती है। हर 10 में से लगभग 4 बच्चे उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी किए बिना स्कूल छोड़ देते हैं।
बुनियादी दक्षता में गिरावट:
कक्षा 8 के केवल 71.1% बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पाते हैं (जो 2014 में 74.7% था)।
कक्षा 8 के केवल 45.8% छात्र ही बुनियादी भाग (Division) का सवाल हल कर पाते हैं।
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सरकारी स्कूलों से पलायन: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी के कारण सरकारी स्कूलों में नामांकन 2005 के 71% से घटकर 49.2% पर आ गया है, जबकि निजी (अनएडेड) स्कूलों का हिस्सा बढ़कर 38.8% हो गया है।
गुणवत्ता में प्रांतीय असमानता SEQI सूचकांक में जहाँ केरल और पंजाब जैसे राज्य अग्रणी रहे, वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे विशाल आबादी वाले राज्य निचले पायदान पर रहे।
बुनियादी ढाँचा व शिक्षक
प्राथमिक स्तर पर लाखों शिक्षकों के पद रिक्त हैं। कई राज्यों में एकल शिक्षक बहु-कक्षा संचालन (Single Teacher Multi-class) कर रहे हैं।
नीति आयोग के आंकड़े यह उजागर करते हैं कि सरकारी स्कूलों के विलय के कारण ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में बच्चों (विशेषकर बालिकाओं) की पहुँच कठिन हुई है। ‘ड्रॉप आउट’ दर और ‘लर्निंग आउटकम’ (सीखने का स्तर) की गिरती स्थिति यह सिद्ध करती है कि सरकारी स्कूल कई जगह केवल ‘मध्याह्न भोजन’ (Mid-day Meal) वितरण के केंद्र बनकर रह गए हैं, जहाँ वास्तविक ज्ञानार्जन गौण हो गया है।
उपसंहार: समतामूलक समाज के लिए एक क्रांति की आवश्यकता
यदि भारत को वैश्विक पटल पर एक ‘ज्ञान महाशक्ति’ के रूप में स्थापित होना है, तो शिक्षा को किसी राजनीतिक दल का तात्कालिक एजेंडा नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र का साझा संकल्प बनना होगा।
‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ का अर्थ प्रांतीय भाषाओं या स्थानीय संस्कृतियों का लोप करना नहीं, बल्कि एक समान गुणवत्ता, एक समान अवसर और एक समान मानक स्थापित करना है। जब तक एक प्रशासनिक अधिकारी और एक निर्धन दिहाड़ी मजदूर का बच्चा एक ही छत के नीचे समान स्तर की शिक्षा प्राप्त नहीं करेंगे, तब तक भारत में सामाजिक न्याय का सपना अधूरा ही रहेगा। सरकार को कागज़ी सुधारों से आगे बढ़कर सरकारी स्कूलों में जीवन फूँकना होगा, क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी कक्षाओं की चारदीवारी के भीतर ही गढ़ा जाता है।
राकेश प्रताप सिंह परिहार राष्ट्रीय महासचिव अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति पत्रकार सुरक्षा कानून लागू कराने हेतु संघर्षरत
