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शहीद कैप्‍टन विक्रम बत्रा जी की पुण्यतिथि में वरिष्ठ पत्रकार नितिन सिन्हा की कलम ।

जवान तो हर देश में लाखो-करोड़ो होते हैं,पर उनमे से शायद ही कोई एक जवानी कारगिल हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा(शेरशाह)जैसी होती है।।
नितिन सिन्हा

आज शहीद कैप्‍टन विक्रम बत्रा जी की पुण्यतिथि है. कैप्‍टन विक्रम बत्रा 1999/2000 कारगिल के हीरो कहे जाते है।। आपने इस युद्ध में देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान दिया था. युद्ध के दौरान कैप्‍टन विक्रम बत्रा की बहादुरी,साहस,उच्च कोटि की नेतृत्व क्षमता और बलिदान को घ्यान में रखते हुए भारत सरकार ने आपको सेना के सर्वोच्‍च सम्‍मान परमवीर-चक्र(मरणोपरांत) से सम्‍मानित किया था. करगिल की उस जंग को बीते आज 22 बरस हो चुके हैं,लेकिन इस जंग की दास्ताँ उसके भारतीय नायकों को जाने बिना लगभग अधूरी है.हर बार की तरह इस बार भी पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के द्वारा धोखे से थोपी हुई जबरदस्ती की लड़ाई में 24 साल या उससे कम उम्र के कई भारतीय सैनिकों और अफसरों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।खुद कैप्टन बत्रा 24 साल की उम्र में वीरगति को प्राप्त हुए थे।

भारतीय सेना में कहा जाता है कि कारगिल युद्ध के सबसे बड़े नायक कैप्टन विक्रम बत्रा थे। तब उनका कोड नेम शेर-शाह पाकिस्तानियों के लिए खौफ का पर्याय था।।

कारगिल युद्ध में कैप्टन की भूमिका

वर्ष 1997 के दिसम्बर महीने आपको जम्मू में सोपोर में 13 जम्मू कश्मीर राइफ्लस में लेफ्टिनेट पद पर नियुक्ति मिली थी। जिसके बाद जून 1999 में कारगिल युद्ध में ही आप कैप्टन के पद पर पहुंच गए. इसके बाद कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को श्रीनगर-लेह मार्ग के ऊपर अहम 5140 चोटी को मुक्त करवाने की जिम्मदारी दी गई.कैप्टन ने अपनी टुकड़ी का बखूबी नेतृत्व करते हुए 20 जून 1999 की अल- सुबह साढ़े तीन बचे चोटी को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया.यहाँ कब्जे के पूर्व पाकिस्तानी सेना से जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी। अच्छी और रणनीतिक पोजिशन में बैठी पाकिस्तानी सेना कैप्टन बत्रा और उनकी टीम का प्रहार झेल नही पाई। इसके बाद उन्हें रेडियो पर अपनी ऐतिहासिक जीत का सन्देश देते हुए कहा था,कि sir ये दिल मांगे मोर तब उनका कहा गया यह डायलाग हर देशवासी की जुबां पर चढ़ गया था.

शहादत के दिन जब कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को 4875 की चोटी पर कब्जा करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली. तो उन्होंने इस बार भी जबरदस्त प्रतिरोध का मुकाबला करते हुये सफलता हासिल क़त ली थी।

लेकिन जिस तरह हर संघर्ष में मिलने वाली सफतला अपने पीछे एक गहरा जख्म छोड़ देती है कुछ इसी तरह पॉइंट 4875 की लड़ाई में मिली सफलता में आप बहुत बुरी तरह जख्मी हो गए थे.अंततः 7 जुलाई 1999 को चोटी पर भारत का कब्जा होने से पहले उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ कई पाकिस्तान सैनिकों को खत्म करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी थी. कैप्टन बत्रा की बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया.

आज कारगिल (Kargil) की 4875 की चोटी को विक्रम बत्रा टॉप के नाम से जाना जाता है.

कैसे आए थे सेना में…

कैप्टन बत्रा की कहानी ऐसे नासमझ राजनीतिज्ञों और लोगों के लिए प्रेणास्पद है,जिन्हें सेना में भर्ती होना सिर्फ एक नौकरी या रोजगार का साधन लगता है।।

भारतीय सेना में आने के लिए आपने लाखों की तनख्वाह को ठुकराया था।
बताया जाता है कि सेना में आने के पूर्व विक्रम बत्रा का सेलेक्शन मर्चेंट नेवी में हांगकांग की एक बड़ी शिपिंग कंपनी में हुआ था. ट्रेनिंग के लिए बुलावा भी आ चुका था लेकिन उन्होंने सेना की वर्दी को ही चुना. मर्चेंट नेवी की लाखों की तनख्वाह देश के लिए जान न्योछावर करने के जज्बे के सामने बौनी साबित हुई.

विक्रम के पिता ने बताया था कि गणतंत्र दिवस परेड में NCC कैडेट के रूप में हिस्सा लेना विक्रम का सेना की तरफ झुकाव का पहला कदम था.मर्चेंट नेवी के लाखों के पैकेज को छोड़ विक्रम बत्रा ने कुछ बड़ा करने की ठानी और 1995 में I.M.A (इंडियन मिलेट्री एकेडमी)की परीक्षा पास की थी।

कैप्टन साहब के शहादत को पुनः कोटि-कोटि नमन।।?

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