
(वरिष्ठ पत्रकार नितिन सिन्हा की कलम )
फरमान निकाला गया है,,,अधिकारियों के पास इतना समय है ये सब लिखने का,,,,इतना ही समय स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने में लगाए होते तो आज दृश्य कुछ और ही होता,,,
चींटी के बिल म माटी तेल डाले के समय आ गए हे,,, अऊ बाहर आही ऐसने अधिकारी अउ एकर फरमान
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग ने जो नया आदेश जारी किया है, वह लोकतंत्र के चेहरे पर एक करारा तमाचा है। अस्पतालों में पत्रकारों को रिपोर्टिंग के लिए जनसंपर्क अधिकारी से अनुमति लेनी होगी — यह फरमान पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि विभाग के भीतर आखिर ऐसा क्या छिपा है, जिसे दुनिया से छुपाने की इतनी बेचैनी है!
दरअसल, यह आदेश एक बीमार मानसिकता का नतीजा है।
जब सिस्टम खुद गड़बड़ी से ग्रस्त हो, जब भ्रष्टाचार भीतर तक जड़ें जमा चुका हो, जब मरीजों की चीखें दीवारों में कैद कर दी जाती हों — तब ऐसे ही आदेश निकलते हैं। यह आदेश साफ संदेश दे रहा है कि अस्पतालों में बहुत कुछ गड़बड़ है। हमारा शक था कि पर्दे के पीछे गंदा खेल चल रहा है, अब वह शक यकीन में बदल गया है।
किससे डर है आपको स्वास्थ्य विभाग?
पत्रकार आएंगे तो क्या दिखाई देगा?
मरीजों का शोषण?
मेडिकल माफिया?
फर्जी बिलिंग?
दवाओं में घोटाला?
गुणवत्ता विहीन इलाज?
या फिर डॉक्टरों-बिचौलियों की सांठगांठ?
पत्रकार तो सच लिखेंगे। कैमरा चलाएंगे। सवाल पूछेंगे।
यही डर आपको सता रहा है। क्योंकि सच सामने आने पर कुर्सियाँ हिलती हैं।
माननीय मुख्यमंत्री जी,
यह आपकी सरकार के लिए शर्म की बात है। आपने लोकतंत्र की शपथ ली थी, सेंसरशिप की नहीं। यह आदेश आपके शासन में एक काले अध्याय की शुरुआत है। पत्रकारों को अनुमति का गुलाम बनाना आपकी प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है।
ध्यान रखिए — पत्रकारिता सत्ता के तलवे चाटने का नाम नहीं है।
हम तो सच उजागर करने के लिए हैं।
हमारे कैमरे रुकेंगे नहीं।
हमारी कलम झुकेगी नहीं।
हमारी आवाज़ बंद नहीं होगी।
यह आदेश रद्द कीजिए — अभी।
वरना याद रखिए —
पत्रकारिता तब और मजबूत होती है, जब उसे कुचलने की कोशिश होती है।
और हम वह आग हैं जिसे दबाने से वह और भड़कती है।



