छत्तीसगढ़बिलासपुर

बिलासपुर कांग्रेस भवन में वरिष्ठ कांग्रेसियों ने सुबोध को लिया आड़े हाथो.

कांग्रेस नेता राजेश पाण्डेय, अर्जुन तिवारी ने आरोप लगाया की कार्यकर्ताओ की नहीं सुनी जा रही?*

*नगरी निकाय चुनाव को लेकर प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज सुबोध हरितवाल के साथ बैठक लेने पहुँचे थे।*

बिलासपुर :- जैसे जैसे नगरी निकाय के चुनाव का समय नजदीक आ रहा है वैसे वैसे राजनितिक पार्टियां ने बैठकों का दौर शुरू हो गया है कांग्रेस पार्टी की आज कार्यकर्ताओ बैठक प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के अगमन में रखी गई थी जिसमें नगरी निकाय को लेकर चर्चा होनी थी जिसमें कांग्रेस के नेताओं के साथ कार्यकर्त्ता मौजूद थे तभी राजेश पांडेय पूर्व महापौर ने आरोप लगाया की कार्यकर्ताओ की नहीं सुनी जाती है उन्हें भी सुनना चाहिए  इन्ही सब बातो को लेकर पूर्व महापौर अपनी बात प्रदेश अध्यक्ष के. समक्ष रख रहे थे तभी सुबोध हरितवाल ने कुछ अप शब्दों का इस्तेमाल करते हुए राजेश पाण्डेय को रोकने की कोशिश की जिससे बात बिगड गई और दोनों के बीच कहा सुनी हो गई तभी बीच में टोकते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता अर्जुन तिवारी ने भी इसका विरोध किया कोई वरिष्ठ लोगो का अपमान कैसे कर सकता है सुबोध को माफ़ी मांगनी चाहिए काफ़ी हंगामा के बीच बैठक समाप्त  हो गई नगरी निकाय को लेकर होने वाली बैठक बेनतीजा रही।

*कांग्रेस नेता महेश दुबे ने कहा कार्यकर्त्ता सुलभ है तो उसे सुलभ शौचालय ना बनाये :-*

कार्यकर्ता यदि “सुलभ “है तो उसे “सुलभ शौचालय” ना बनाएं अपनी दर्द पीड़ा पार्टी संगठन की बैठक में ना कहे तो कहां कहे स्थानीय निकाय चुनाव है विधानसभा लोकसभा नहीं वहां तो कार्यकर्ताओं की बातें “सुननी” चाहिए न की “सुनाई” जाए इस हालत में कैसे लड़ेंगे चुनाव आप सब सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता धरातल पर पूरी तैयारी कर बैठे हैं नाम जुड़वाने से लेकर हुए परिसीमन का खागा तैयार कर लिया गया है!
और हम हैं कि सिर्फ और सिर्फ संगठन की बैठकों में बड़े नेताओं के भाषण सुनते हैं पर कार्यकर्ताओं की सुनने वाला कोई नहीं लगातार एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद भी शिखर नेतृत्व तनिक भी गंभीर नहीं है अपने संगठनात्मक ढांचे को लेकर वर्तमान में संगठन ऊपर के दिए गए दिशा निर्देश पर कार्य तो करता है पर स्थानीय जनहित के मुद्दे पर मौन साधे बैठा है ,जिसका पूरा लाभ सत्ताधारी दल को प्राप्त हो रहा है विपक्ष की सशक्त भूमिका का निर्वाह हम नहीं कर पा रहे हैं जिसका खामियाजा स्थानीय चुनाव में दिखाई देगा सदैव पार्टी संगठन के लिए समर्पित कार्यकर्ता अपने ही चुनाव में ठगा सा महसूस करेगा हो सकता है कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने की और उनके मन की बात जानने सुनने की पर यहां सब कुछ उल्टा पुल्टा ही हो रहा है आज जब कार्यकर्ता की परी है तब उनका सुनने वाला कोई नहीं बस एक ही सिद्धांत चल रहा है मेरी मर्जी…..!!

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